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सोमवार, 31 जनवरी 2011

लखनऊ यात्रा - गाइड माहात्म्य.

पिछली पोस्ट में गाइड के बारे में लिख रहा था. पहले ही बता चुका हूं कि बाहर ASI ने कहीं भी नहीं लिखा है कि गाइड अनिवार्य है, लेकिन अन्दर जगह जगह पर टंगे बोर्ड कुछ और ही कहानी बयान कर रहे थे.  इस चित्र को देखिये, जहां लिखा है कि भूल-भुलैया में एक स्त्री और एक पुरुष के साथ एक गाइड अनिवार्य है.
यद्यपि नीचे कहीं भी ASI का कोई निशान इत्यादि नहीं था. जिससे यह भी लग रहा था कि सम्भवत: यह ASI ने नहीं लगाये होंगे. खैर, पहले ही लिख चुका हूं कि जैसे ही प्रवेश किया, पहले कुछ बच्चों से सामना हुआ और संयोग देखिये कि उनमें से एक का नाम आसिफ था. अब पता नहीं कि आसिफुद्दौला से प्रभावित होकर उसका नाम रखा गया या फिर यूं ही. नन्हां सा आसिफ अपने दोस्तों के साथ. इससे पहले भारत के प्राचीनतम खेलों में से एक द्यूत क्रीडा को अभी भी जिन्दा रखने का प्रयास यहां कुछ नौजवानों के द्वारा किया जा रहा था. अब इस ऐतिहासिक परम्परा को निभाने में लगे होनहारों को डिस्टर्ब न करते हुये नजर ऊपर की तरफ दौड़ाई. ऊपर भी बुलन्दगी की इबारत दर्ज थी. बच्चों की बड़ी तीव्र इच्छा थी एक दरवाजानुमा खिड़की में खड़े होने की, लिहाजा उसे पूरा किया गया. यहां भी अमर प्रेम की अमर गाथाएं सदियों तक अमर रहने के लिये अंकित थीं. हम लोग वैसे भी अपनी छाप हर जगह छोड़ने को बेकरार रहते हैं, फिर चाहे वह गुटकों के खाली पाउचों,  तम्बाकू-सिगरेट की डिब्बियों या फिर चिप्स के पैकेटों के रूप में ही क्यों न हो. यह निशानियां भी बहुतायत में थीं. लेकिन उन से यह पता नहीं चल पा रहा था कि कौन सी निशानी किस ने छोड़ी है.
आर्कियालाजीकल सर्वे वाले खाली न बैठे रहें, इसलिये हमारे यहां के लोग इमारत के ईंट-पत्थरों को लेकर कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे कि आर्कियालाजीकल सर्वे वालों को सुधारने का कार्य मिलता रहे. आसफुद्दौला द्वारा बनाई गयी मस्जिद को देखने की इच्छा थी. लेकिन मस्जिद बन्द भी थी और एक बोर्ड यह लगा था जिससे कि बाहर से ही देख सके. अन्दर से रूमी दरवाजा भी बहुत खूबसूरत नजर आता है, लखनऊ का प्रवेश द्वार है यह.
बावड़ी देखने के बाद अन्दर जाने की नौबत जब आई तो दरवाजे में पैर रखते ही एक सज्जन ने पूछा कितने लोग? बताया चार हैं और एक आने वाले हैं, तुरत-फुरत रजिस्टर में नोट और आवाज फेंकी, ये मुन्ने मिर्जा के हैं. मानो इन्सान न होकर हम लोग कोई सामान हैं जो मुन्ने मिर्जा के हैं. उसके बाद फिर गाइड के रुपये जमा करने को कहा गया. जब मैंने कहा कि मुझे गाइड नहीं चाहिये तो मामला संगीन हो गया. मुझे समझाया गया कि इसके अन्दर आप बिना गाइड के नहीं जा सकते. मैंने इस पर आर्कियालाजीकल सर्वे के बाहर लगे बोर्ड के बारे में बताया तो वहां पर बैठे लोग लगभग लड़ने पर उतारू हो गये. जब मैंने बाहर जाने के लिये कहा तो कहा गया कि आपने इस प्रवेश द्वार पर पैर रख दिया है, अब बाहर नहीं जा सकते. कमाल था. फिर जब मैंने उन लोगों से कुछ और सवाल जवाब किये, तो वे थोड़ा सा सकपकाये. फिर मैंने बाहर बोर्ड पर दिये गये नम्बर पर बात करने की कोशिश की तो बात नहीं हो सकी. पता नहीं नम्बर बन्द थे या फिर कोई और कारण था. पत्नी जी ने भी गरमा-गरमी का माहौल देखकर शान्त होने को कहा और फिर उन गाइडों में से भी किसी ने कहा कि यदि गाइड करने की इच्छा नहीं है तो न कीजिये. फिर पत्नी जी ने कहा कि कर लीजिये तो उनका कहा मानना पड़ा. वहां नियत सौ रुपये की जगह डेढ़ सौ रुपये लिये जा रहे थे, मजबूरन देना पड़े. यह राशि पूरे इमामबाड़े (जिसमें बावड़ी शामिल है) के लिये नियत है, लेकिन वहां केवल इमामबाड़ा और भूलभुलैया (जोकि इमामबाड़े की छत पर बनी है) के लिये गाइड दिखाता है. वही चार-छ: रटी-रटाई बातें. कुछ और पूछना चाहो तो बताने में हीला-हवाली, जिसका कारण मुझे लगता है कि जानकारी न होना और दूसरा यह कि अगला नम्बर पाने के लिये वर्तमान ग्राहक को फटाफट निपटाना होता है. हमारे गाइड यह थे.

जारी...

4 टिप्‍पणियां:

  1. यात्रा व्रतांत के साथ फोटो भी बहुत अच्छे .
    बहुत देर से आये आप ब्लाग लिखने . एक अच्छे ब्लागर की पुरी स्म्भावनाये आपने अपनी चंद पोस्टो मे दिखा ही दी है

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  2. इन guids का स्तर किसी भी मामले में घाट के पण्डे से कम थोड़ी है. आपने एक खोजपूर्ण वृत्तान्त को परिहासपूर्ण तरीके से लिखा है.....साधुवाद.

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